Thursday, May 31, 2018

4 लोकसभा, 10 विधानसभा सीटों के उपचुनावों का FINAL RESULT


4 लोकसभा, 10 विधानसभा सीटों के उपचुनावों का FINAL RESULT
उपचुनाव के नतीजे घोषित
देश के 10 राज्यों की 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों के नतीजे गुरुवार को घोषित हुए. इन उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगा है. बीजेपी सिर्फ दो सीटों पर जीत दर्ज कर पाई, जबकि कई जगह उसे मुंह की खानी पड़ी.
इन सीटों में से सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट, महाराष्ट्र की पालघर और उत्तर प्रदेश की ही नूरपुर विधानसभा सीट थीं. इसमें कैराना और नूरपुर में एकजुट विपक्ष के आगे बीजेपी ने घुटने टेक दिए. इन 14 सीटों के अलावा महाराष्ट्र की एक सीट पर निर्विरोध रूप से कांग्रेस उम्मीदवार ने जीत दर्ज की. इन उपचुनाव नतीजों को 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बड़े संदेश के रूप में देखा जा रहा है.
सभी 14 सीटों पर हुए उपचुनाव में किसने जीत दर्ज की है, यहां पढ़ें....
लोकसभा सीटें...
1. उत्तर प्रदेश: बहुचर्चित कैराना लोकसभा सीट पर रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने बड़ी जीत हासिल की है. तबस्सुम को 481182 वोट मिले. वहीं, बीजेपी की उम्मीदवार मृगांका सिंह को 436564 वोट मिले हैं. तबस्सुम ने 44618 वोट के अंतर से जीत दर्ज की है. रालोद उम्मीदवार तबस्सुम को सपा, बसपा, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष का समर्थन प्राप्त था.
2. महाराष्ट्र : गोंदिया-भंडारा लोकसभा सीट पर एनसीपी उम्‍मीदवार मधुकर कुकड़े ने जीत दर्ज की है. मधुकर को 442213 वोट मिले हैं. वहीं, बीजेपी के उम्‍मीदवार हेमंत पटले को 384116  वोट मि‍ले हैं. एनसीपी ने 48097 वोटों के अंतर से जीत हासिल की है.
3. महाराष्ट्र : पालघर लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला अपनी ही साथी शिवसेना से था. यहां पर बीजेपी के उम्मीदवार राजेंद्र गावित ने करीब 29 हज़ार वोटों से जीत दर्ज की. शिवसेना ने भाजपा के दिवंगत सांसद चिंतामण वनगा के बेटे श्रीनिवास वनगा को अपना उम्मीदवार बनाया था.
4. नगालैंड : नगालैंड सीट पर बीजेपी समर्थ‍ित NDPP के उम्‍मीदवार तोखेहो येपथेमी ने जीत दर्ज की. तोखेहो येपथेमी को 594205 वोट मिले, कांग्रेस समर्थ‍ित NPF के उम्‍मीदवार सी अपोक जमीर को  420459 वोट मिले हैं. तोखेहो येपथेमी ने 173746 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की.  
विधानसभा सीटें...
1. उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश के बिजनौर की नूरपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सपा उम्मीदवार नईमुल हसन ने बीजेपी उम्मीदवार अवनि सिंह को 6211 मतों से मात दी है. जबकि ये सीट बीजेपी की सबसे मजबूत सीट मानी जाती थी, वहीं, सपा का इस सीट पर पहली बार खाता खुला है.
2. बिहार : यहां की जोकीहाट विधानसभा सीट पर राजद उम्मीदवार शाहनवाज आलम ने बड़ी जीत हासिल की है. शाहनवाज ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी जेडीयू के मुर्शीद आलम को 41,224 मतों के अंतर से हराया. शाहनवाज को 81,240 जबकि मुर्शीद को 40,016 मत हासिल हुए.
3. उत्तराखंड : थराली विधानसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी मुन्नी देवी ने 1872 वोटों से जीत दर्ज की. उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी जीतराम को मात दी.
4. केरल : केरल के चेंगन्नुर सीट पर CPM उम्मीदवार एस चेरियां ने 20956 वोटों से जीत दर्ज की. यहां CPM को 67303 वोट, कांग्रेस को 46347 वोट और BJP को 35270 वोट मिले.
5. झारखंड : यहां की सिल्ली विधानसभा सीट पर झारखंड मुक्ति मोर्चा की सीमा महतो ने बड़ी जीत दर्ज की. उन्होंने एजेएसयू के सुदेश महतो को मात दी.
6. पंजाब : शाहकोट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के हरदेव सिंह लाडी ने बाजी मारी. कांग्रेस के हरदेव सिंह लाडी ने अकाली दल के नायब सिंह कोहाड़ को 38802 वोटों से हराया.
7. पश्चिम बंगाल: महेश्तला विधानसभा सीट पर TMC ने 62896 वोटों से जीत दर्ज की. यहां TMC को 104818 वोट, बीजेपी को 41993 वोट और सीपीएम को 30316 वोट मिले. टीएमसी के दुलाल दास ने बीजेपी के सुजीत घोष को मात दी.
8. मेघालय: अंपाती सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार मियानी डी शिरा ने 3191 वोटों से जीत दर्ज की. मियानी ने नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के उम्मीदवार जी मोमीन को मात दी.
9. झारखंड : गोमिया विधानसभा क्षेत्र पर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने बड़ी जीत दर्ज की है. गोमिया सीट पर जेएमएम उम्मीदवार बबीता देवी ने आजसू के उम्मीदवार को करीब 2000 मतों से हराया.
10. कर्नाटक : राजराजेश्वरी विधानसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार मुनिरत्ना ने 25,492 वोटों से जीत दर्ज की है. यहां कांग्रेस को 108064, बीजेपी को 82572 और जेडीएस को 60360 वोट मिले. उन्होंने बीजेपी के मुनिराजू गौड़ा को मात दी है.
11. महाराष्ट्र की इस सीट पर निर्विरोध जीती कांग्रेस
महाराष्ट्र की पलूस-कडेगाव विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के विश्‍वजीत कदम ने निर्विरोध जीत हासिल कर ली है. यह सीट विश्‍वजीत के पिता और वरिष्‍ठ कांग्रेस नेता पतंगराव कदम के निधन से खाली हुई थी. यहां पर पहले बीजेपी ने कांग्रेस प्रत्याशी विश्वजीत कदम के खिलाफ संग्राम सिंह देशमुख को उतारा था, लेकिन आखिरी वक्त उन्होंने नामांकन वापस ले लिया.


बाबुल इनायत
9507860937
सोशल मीडिया प्रभारी,राष्ट्रीय जनता दल अररिया बिहार


Tuesday, May 29, 2018

क्या कांग्रेस के दबाव में तेजस्वी को महागठबंधन में नीतीश को दोबारा एंट्री देनी चाहिए?

इधर पिछले दो महीने से यह सुगबुगाहट है कि कांग्रेस सरपंच बनने की अपनी ख़ानदानी आदत और पुश्तैनी बीमारी से लाचार होकर राजद पर धीरे-धीरे यह दबाव बना रही है कि आगामी चुनाव में वो नीतीश की पिछली बेहयाई को भूलकर उन्हें साथ ले ले। ज्योंहि तेजस्वी ने दूरगामी राजनीति के लिहाज से यह आत्मघाती क़दम उठाया कि न सिर्फ़ उनके परंपरागत वोटर्स में ग़लत संदेश जाएगा, बल्कि उनका मनोबल भी चकनाचूर होगा। किसी तरह के दबाव के आगे नहीं झुकने वाले ही बेहतर निगोशिएट कर पाते हैं। अभी से अगर तेजस्वी किसी स्वनामधन्य सलाहकार के चक्कर में पड़कर उलटपुलट डिसीजन लिए, तो उन पर न सिर्फ़ “एकात्म कुर्सीवाद” (अजित अंजुम का ईज़ाद किया हुआ टर्म है) का आरोप लगेगा, बल्कि बड़ी लगन से बेहद कम अवधि में अर्जित अपनी विश्वसनीयता भी खो देंगे। उत्थान मुश्किल होता है, पतन की राह तो हमेशा से आसान रही है। ख़याल रहे कि कांग्रेस का इतिहास ही है कि वो कभी किसी क्षेत्रीय दल या नेता को फलते-फूलते नहीं देखना चाहती। ठीक है कि अभी भाजपा ने पूरे देश में कहर बरपाया हुआ है, मगर अपने वुजूद को कांग्रेस के इशारे पर कहीं किसी में विलीन कर देना सिवाय मूर्खतापूर्ण डिसीजन के और कुछ नहीं कहा जाएगा।
बहुत कम लोगों को पता है कि पिछले विधानसभा चुनाव के ठीक बीच में लालूजी को एक बड़े पत्रकार ने यूं ही बातचीत में कहा कि बिल्कुल सही वक़्त पर देशहित में सही फ़ैसला आपने लिया, सरकार तो आपके गठबंधन की ही बनने जा रही है, कहीं कोई शकोसुबहा नहीं है; पर स्पीकर का पद मत छोड़िएगा। लेकिन, लालूजी ने उस बात को बहुत हल्के में लिया कि हां, वो कोई मसला नहीं है, 20 से पहले कहां जाएगा। इतना भरोसा था उन्हें नीतीश जी पर।
अब मुझे नहीं मालूम कि किस तज़ुर्बे के आधार पर दिलीप मंडल जी नीतीश की फिर से गठबंधन में एंट्री की वकालत कर रहे हैं। कम-से-कम पिछले बीस वर्षों से तो नीतीश जी की राजनीति के पैटर्न, स्टाइल और वर्क कल्चर को फॉलो कर ही रहा हूँ और कुछ पिताजी की सियासी सक्रियता की वजह से भी अंदर की बात पता चल जाती थी। इस आदमी के बारे में यूं ही हवा में नहीं कह दिया जाता कि कभियो इ पलट के काट ले सकता है। इतिहासे है इनका। अब मैं आपके सामने दिलीप जी के प्रस्ताव को यहाँ एज इट इज़ रख दे रहा हूँ, “मेरी राय है कि नीतीश को गठबंधन में ले लेना चाहिए. बाकी बाद में देखना चाहिए कि क्या करना है. नीतीश को सीट कम देनी चाहिए. बीजेपी भी 8 सीट ही दे रही है. तेजस्वी भी इतनी ही दे दें.”
इस नहले पे दहला मार दिया है या यूं कहें कि अच्छा मज़ाक किया है महेंद्र यादव जी ने, “नीतीश को अगर आरजेडी ने फिर साथ ले लिया तो शरद यादव का क्या होगा.. नीतीश साथ आना चाहते हैं तो उनके सामने कुछ शर्तें रखी जानी चाहिए- 1. नीतीश पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ें और शरद यादव को दें। 2. आरसीपी जैसों से राज्यसभा सीट खाली कराके शरद यादव और अली अनवर को दें। 3. मुख्यमंत्री पद छोड़ें, और शरद यादव अनुमति दें तो उपमुख्यमंत्री बनें। 4. स्पीकर आरजेडी का बनवाएं। 5. लोकसभा चुनाव में सीटों का बँटवारा लालू जी और शरद जी करें, और स्वाभाविक रूप से जेडीयू में टिकट शरद यादव बांटें।”
ऐसा है कि बिहार की राजनीति सर्कस नहीं है और यहाँ की जनता कोई फुटबॉल नहीं कि जब जिसको मन हो आके किक लगा दे कभी सेंटर से कभी फॉरवर्ड से। जैसे बड़ी चालाकी से महागठबंधन में सटकर जीत के नीतीश भाग गए अपने पुराने यार के पास, वैसे ही लोकसभा की सीटें भी सटकर जीत लेंगे और फिर मोदी-शाह अपने डंडे से इनको हांक के अपने टेंट में लेके चले जाएंगे। हां, इस पूरे खेल में सेल्फ गोल करने का किसी का मन हो तो कौन क्या करे! यहाँ की जनता का न्यायबोध ज़बरदस्त है, कोई ख़ुद को ढेर क़ाबिल समझने लगता है और उसे फॉर ग्रांटेड लेता है कि जैसे मन होगा वैसे हांक लेंगे या जोत देंगे, तो उसे बढ़िया से ठिकाने भी लगा देती है। बाक़ी,
जम्हूरियत में कम-से-कम इतनी आज़ादी तो है
के हमको ख़ुद करना है अपने क़ातिलों का इंतख़ाब। (शायद जिगर या कैफ़ी)
मोदी-शाह वाले एनडीए में अपनी डांवाडोल स्थिति को भांपते हुए, 19 में फिनिश होने के खतरे को आंक कर बिहार में मज़बूत विपक्ष को देख ललचाए नीतीश कुमार का कल बयान आया कि नोटबन्दी से सिर्फ़ ग़रीबों का नुकसान हुआ। आगामी लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर होता नुकसान देख जनाब का यह बयान आया है। नीतीश इतने बड़े महामूर्ख तो हैं नहीं कि उन्हें तब समझ में नहीं आया जब समर्थन कर रहे थे। गांव में लोग कहते हैं कि ढेर क़ाबिल आदमी तीन जगह माखता है। दम धरिए, अभी तो इनकी दुर्गति शुरू हुई है! बहुत कुछ भुगतना बाक़ी है। आरएसएस अभी इनका नाक रगड़वाए बगैर इन्हें छोड़ेगा नहीं।
इसके पहले 15 मार्च को भी दिलीप जी ने नीतीश कुमार के प्रति रहम बरतने का मंतव्य प्रकट किया था। तब भी दिलीप मंडल जी का कुछ इसी से मिलता-जुलता प्रस्ताव था- “नीतीश कुमार पल्टी मारें, तो तेजस्वी यादव को दिल बड़ा कर लेना चाहिए”। मैं तेजस्वी को इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज़ करने का अयाचित परामर्श देने का दुस्साहस करता हूँ। हज़ार बार कह चुका हूँ कि लालू-विरोध ही नीतीश जी की एकमात्र युएसपी है, वो लालू प्रसाद का विरोध करना छोड़ दें, तो उनके पास अपना बचेगा क्या सिवाय सिफ़र के?
अलौली (खगड़िया) में एक जगह है हरिपुर, कुर्मी बाहुल क्षेत्र। नीतीश जी को तब भी वहाँ प्रचार के लिए बुलाया जाता था जब अविभाजित जनता दल था और तब भी जब वो जनता दल (जॉर्ज) को समता पार्टी का रूप दे चुके थे।
एक बार लालू प्रसाद के ख़िलाफ़ बोलते-बोलते वो बहक गए यह सोचते हुए कि सजातीय लोगों का इलाक़ा है, यहाँ कौन क्या कहेगा। उन्होंने कहा, “लालू प्रसाद मुंज हैं जिनकी जड़ में मट्ठा डालके हम तहसनहस कर देंगे”। इतना सुनना था कि लालूजी के दल के कुर्मी जाति, पासवान जाति और यादव जाति (यादव बहुत कम संख्या में हैं उस इलाक़े में) से संबद्ध लोग ईंटा-पत्थर मंच पर फेंकना चालू कर दिए। अपना ऊबाऊ-झेलाऊ भाषण बीच में ही छोड़छाड़कर उन्हें भागना पड़ा, बमुश्किल उन्हें हैलीपैड तक पहुंचाया गया।
इस प्रसंग का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूँ की नीतीश कुमार के मन में लालू प्रसाद के लिए किस कदर ज़हर घुला हुआ है। इसलिए, सियासी रूप से कमज़ोर होने पर नीतीश जी की रोनी सूरत पर मत जाइए। ज़रा सा वो ताक़तवर होंगे कि भस्मासुर की तरह आपही के माथे पर हाथ धरने के लिए परपरिया रौदा ( चिलचिलाती धूप) में आपको दौड़ते रहेंगे। इसलिए,सावधान! अब सियासत भावुकता से नहीं चलेगी कि नीतीश के पास भावना है ही नहीं। व्यक्तिगत जीवन में भी और सामाजिक-राजनैतिक जीवन में भी भयंकर रूप से क्रूर आदमी हैं। कैसे भूल जाते हैं लोग कि उपेंद्र कुशवाहा की वयोवृद्ध मां समेत पूरे परिवार को सामान सहित रात में आवास से फेंकवा दिया, पासवान को तो नेस्तनाबूद करके ही छोड़ दिया, सतीश कुमार, दिग्विजय और जॉर्ज को ख़ून के आंसू रुला दिए, उदयनारायण और जीतनराम को लगातार ज़लील किया। महागठबंधन बनने से पहले ख़ुद लालू की पार्टी को चकनाचूर कर देने से बाज नहीं आए।
नीतीश ख़त्म हो रहे हों, तो एकदम ख़त्म हो जाने दीजिए। वह व्यक्ति न दया का पात्र है न कोई सहानुभूति डिज़र्व करता है। ऐसे शातिर-धूर्त-चालू-तिकड़मी लोगों को दूध-लावा नहीं चढ़ाया करते, नहीं तो काटने पर ट्वीटर पर मत कोस कर ट्रेंड कराया कीजिए कि नीतीश ट्वायलेट चोर है। उस आदमी को खाद-पानी देके पालिए-पोसिएगा तो एक दिन फिर डंसेगा ही। लालूजी की सब बात भूल जाइए, बस उनकी एक पसंदीदा लोकोक्ति याद रखिए:
रोपे पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय।
बाक़ी, जो मन आए सो कीजिए।

चौधरी चरण सिंह जी के पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित

देश में किसान संघर्ष का सनातन पर्याय रहे देश के पांचवें प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी की पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित!
#चौधरी_चरण_सिंह

Sunday, May 27, 2018

बिहार की हकीकत से रूबरू बाबुल इनायत

यदि आपको बिहार की स्थिति समझनी है तो कभी फुर्सत में समय निकालकर दोपहर १ - १.३० बजे नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म संख्या १४ पर जाइये ! आप में से बहुत लोगों ने यह दृश्य कभी नहीं देखा होगा । प्लेटफार्म के आगे और पीछे साइड सैंकड़ों लोग लाइन में लगे रहते हैं । भीड़ इतनी ज़बरदस्त कि उसे संभालने और किसी अप्रिय घटना को रोकने के लिए RPF के कई जवान तैनात रहते हैं । यह भीड़ बिहार के उन गरीब व्यक्तियों कि रहती है जो बिहार-संपर्क क्रांति एक्सप्रेस के सामान्य (जनरल) डिब्बे में चढ़ने आये होते हैं । २.३० पर जो ट्रेन खुलती है उसके जनरल डिब्बे में चढ़ने भर कि जगह मिल जाये इसलिए ये लोग सुबह १०-११ बजे से ही लाइन लगाना आरम्भ कर देते हैं । इनका गंतव्य सीवान, छपरा, सोनपुर, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर एवं दरभंगा रहता है । RPF कि मौजूदगी के बावजूद मार-पीट, भगदड़, लाठीचार्ज बहुत ही सामान्य है ।
.
जनरल डिब्बे की क्षमता १०० लोगों की होती है, परन्तु हर डब्बे में कम से कम २५० लोग तो अवश्य रहते हैं । एक सीट पर चार कि जगह आठ लोग बैठते हैं तो नौवां आ कर कहता है, "थोड़ा घुसकिये जी, आगे-पीछे हो कर बैठिएगा तो थोड़ा जगह बनिए जाएगा । शौचालय से ले कर पायदान तक एक भी जगह खाली नहीं रहता । यदि आप एक बार अंदर चले गए तो शायद शौचालय जाने के लिए ऎसी जद्दोजहद करनी होगी कि शायद आधा-एक घंटा इसी में निकल जाए । यही स्थिति प्रायः बिहार जाने वाली सभी ट्रेन में रहती है - वैशाली एक्सप्रेस, विक्रमशिला एक्सप्रेस, सम्पूर्ण क्रांति एक्सप्रेस, स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस, महाबोधि एक्सप्रेस इत्यादि । यदि आप दिल्ली में नहीं रहते तो कोई बात नहीं । मुंबई, इंदौर, जालंधर, सूरत, अहमदाबाद, बैंगलोर एवं पुणे से जो ट्रेनें बिहार जाती हैं, आप उनमें भी यही स्थिति पाएंगे ।
.
बिहार में नौकरी नहीं है । यदि आप बिहार सरकार की नौकरी नहीं कर रहे तो बिहार में आपके लिए कुछ नहीं है । उद्योग का नामोनिशान नहीं है । आप मजदूर हों या मैकेनिक, अकाउंटेंट हों या मैनेजर, इंजीनियर हों या वैज्ञानिक, बिहार में आपके लिए कुछ नहीं है । यहां तक कि खेती करने वाले मजदूरों को भी पंजाब और हरयाणा आ कर बड़े किसानों के यहाँ मजदूरी करनी पड़ती है । दिल्ली में रिक्शा चलाने वाले, कंस्ट्रक्शन लेबर, इधर-उधर काम करने वाले मजदूर - अधिकतर बिहार के होते हैं । यही हाल देश के अन्य शहरों में है विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य-प्रदेश और पंजाब ।
.
बिहार को सुनियोजित ढंग से ख़तम कर दिया गया । बिहार को जातिवाद की आग में सालों जलाया गया , गुंडागर्दी और रंगदारी को बेलगाम होने दिया गया, सभी उद्योगों एवं नौकरियों पर क्रूरता से प्रहार किया गया । प्रहार ऐसा कि आज तक बिहार नहीं उभर पाया है । सामजिक न्याय और समाजवाद के नाम पर लोगों को कहा गया कि सड़क और बिजली का कोई काम नहीं क्यूंकि सड़क पर गाड़ियां अमीरों कि चलती हैं और बिजली से मौज-मस्ती अमीरों के घर में होता है । यूनियन और गुटबाजी कर के सारे चीनी मिल और उद्योगों को बंद करा दिया गया । उद्योगपति, इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेसर, शिक्षक, स्किल्ड मैकेनिक, एक-एक कर सभी बिहार छोड़ते चले गए । गाँव से जो अनवरत पलायन आरम्भ हुआ वो आज तक जारी है । नीतीश जी ने रोड और बिजली अवश्य दे दिया, परन्तु पिछले 13 वर्ष में उद्योग नहीं आरम्भ कर सके । इस कारण से आज भी बिहार में यदि कोई चारा है तो सरकारी नौकरी ही है । दुःख की बात यह है कि लोग समझते नहीं हैं कि सरकार सभी को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती ।
.
नौकरी का सबसे बड़ा स्रोत निजी क्षेत्र ही होता है । गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, कर्णाटका, तमिल नाडु - ये सब वो राज्य हैं जहाँ बिहार के लोग नौकरी कि तलाश में जाते हैं - छोटी से छोटी नौकरी से ले कर बड़ी नौकरी तक । इसका कारण एक ही है - यह सभी राज्य industrialised हैं । बिहार में एक ऐसी धारणा बना दी गयी सालों तक कि उद्योगपति लूटेरे होते हैं, उद्योग लगाना एक डाका है । प्राइवेट मतलब लूट । इंडस्ट्री को लूट का पर्याय बना दिया गया । आज बिहार में आलम यह है कि लोग धक्के और ठोकर खाते हुए देश के विभिन्न राज्य में नौकरी करने जाएंगे, लेकिन जैसे ही उद्योग की बात करो सबसे पहले उद्योगपतियों को गाली देंगे । अपने आप में यह एक विचित्र विडम्बना है बिहार के इस समाज की ।
.
जब तक कोई ऎसी सरकार नहीं आती बिहार में जिसका प्रमुख फोकस "Industrialization" हो, बिहार इसी गर्त में डूबा रहेगा । पलायन जारी रहेगा और जनता कि निराशा बढ़ती रहेगी । आज दिल्ली, मुंबई, जालंधर, सूरत, बैंगलोर, चेन्नई, इंदौर, पुणे जैसे शहर अपनी क्षमता से कई गुना अधिक बोझ उठाये हुए हैं । इस प्रेशर के कारण इन शहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर भी चरमरा चूका है । यह शहर और लोगों को नहीं समा सकते । जब तक बिहार नहीं उठेगा, यह देश नहीं उठ सकता । हम कब तक दुसरे राज्यों पर बोझ बनेंगे ? हम कब तक घर से दूर ठोकर खाते फिरेंगे ? हम कब तक अपनी मिटटी से दूर सिर्फ जीवनयापन की तलाश में दर-दर भटकते फिरेंगे ? क्या बिहार कभी अपने उस स्वर्णिम दौर को पुनः प्राप्त कर सकेगा ? आज देश के जिस राज्य में जाता हूँ, उसका हाल बिहार से बेहतर ही पाता हूँ । यह पीड़ा शायद एक बिहारी ही समझ सकता है ।
.
मेरी आप सभी से एक ही सलाह है - छद्म "सामाजिक न्याय" और "समाजवाद" के नाम पर जातिवाद का जहर फिर से न पनपने दीजिये । हमने इसे सालों झेला है और आज भी उसी पीड़ा का अनुभव कर रहे हैं । एक बिहार फिर भी किसी तरह से इसे संभाल रहा है । इस देश में ३० बिहार न होने दीजिये । हम कहीं के नहीं रहेंगे, हमारी अगली पीढ़ी केवल और केवल हमें कोसेगी । जो भाग सकते हैं, वो विदेश भाग जायेंगे या फिर कोई न कोई उपाय निकाल लेंगे । जो पिसेंगे वह मध्यम-वर्ग, निम्नमध्यम-वर्ग और गरीब तबका ही होगा । आज भी जो बिहार में अमीर हैं, उनकी जिंदगी में शायद ही कोई दिक्कत आया है । बिहार इस देश के लिए एक सीख है । इस देश में और बिहार न होने दीजिये ।
बाबुल इनायत
09507860937
सोशल मीडिया प्रभारी, राष्ट्रीय जनता दल अररिया बिहार

Tuesday, May 8, 2018

जिस इंसान के कर्म अच्छे ओर सन्तुलित होते है,
उसके जीवन मे कभी अंधेरा नही होता।
                                बाबुल इनायत
बाबुल इनायत
9507860937
सोशल मीडिया प्रभारी,राष्ट्रीय जनता दल अररिया

                                               

Monday, April 30, 2018

खुल गया राजः RSS की गवाही से हुई थी भगत सिंह, राजगुरू, और सुखदेव को फांसी

खुल गया राजः RSS की गवाही से हुई थी भगत सिंह, राजगुरू, और सुखदेव को फांसी

 पाकिस्तान के लाहौर उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल कर अनुरोध किया गया कि ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा शहीद-ए-आज़म भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद उनकी बेगुनाही साबित करने के लिए उनके खिलाफ दर्ज हत्या के मामले में एक पूर्ण पीठ जल्द सुनवाई करे। इस याचिका पर आज के ही दिन सुनवाई होनी है।
भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष वकील इम्तियाज राशिद कुरैशी ने यहां उच्च न्यायालय में एक आवेदन दाखिल कर मामले में जल्द सुनवाई की गुहार लगाई। कुरैशी ने अपनी याचिका में कहा कि भगत सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने अविभाजित भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी थी।
ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी सांडर्स की कथित हत्या के मामले में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। ब्रिटिश शासन ने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दे दी थी। उन पर औपनिवेशिक सरकार के खिलाफ साजिश रचने के आरोपों के तहत मुकदमा चला था।
कुरैशी ने कहा कि सिंह को पहले आजीवन कैद की सजा सुनाई गई, लेकिन लेकिन बाद में एक और झूठे गढ़े मामले में उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। उन्होंने कहा कि भगत सिंह आज भी उपमहाद्वीप में न केवल सिखों के लिए बल्कि मुसलमानों के लिए भी सम्मानित हैं और पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना दो बार उनको श्रृद्धान्जली दे चुके हैं।
कुरैशी ने कहा कि यह राष्ट्रीय महत्व का विषय है और एक पूर्ण पीठ को इस मामले में समाधान करना चाहिए। उन्होंने पुनर्विचार के सिद्धांतों का अनुसरण करते हुए शहीद भगत सिंह की सजा रद्द करने की भी गुहार लगाई और कहा कि सरकार को भगत सिंह को सरकारी पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिये ।
यह समाचार बताने का अर्थ यह है कि अपने पुर्वजों और देश की आज़ादी के नायकों का सदैव सम्मान ही देश की पहचान होती है , बात तारीफ की नहीं है पर यह सच है कि बँटवारे की तमाम कटुता और आज के दुश्मनी के संबंधों के बावजूद भी लाहौर में शहीद भगतसिंह जी से जुड़ी स्मृतियाँ अभी तक वहाँ की धरोहर है और सम्मान पाती रही हैं जबकि इसी भारत में एक गिरोह के द्वारा “महात्मा गांधी” के साथ किया जाता रहा बर्ताव कैसा रहा है यह बताने की आवश्यकता नहीं है।
किसी ने यह पता करने की कोशिश की कि देश की आजादी के लिए शहीद हो जाने वालों के विरुद्ध अंग्रेजों के आदेश पर उनके लिए गवाही देने वाले लोग कौन थे ? और उनके तथा उनके परिवार का आज़ादी के पहले और आज के दौर में क्या हाल है और वह किस स्थिति में हैं।
जब दिल्ली में भगत सिंह पर अंग्रेजों की अदालत में असेंबली में बम फेंकने का मुकद्दमा चला तो भगत सिंह और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त के खिलाफ. शोभा सिंह. ने गवाही दी और दूसरा गवाह था शादी लाल! दोनों को वतन से की गई इस गद्दारी का इनाम भी मिला। दोनों को ब्रिटिश सरकार द्वारा न सिर्फ सर की उपाधि दी गई बल्कि और भी कई दूसरे फायदे मिले। शोभा सिंह को दिल्ली में बेशुमार दौलत और करोड़ों के सरकारी निर्माण कार्यों के ठेके मिले आज कनाॅट प्लेस में सर शोभा सिंह स्कूल में कतार लगती है बच्चो को प्रवेश नहीं मिलता है जबकि शादी लाल को बागपत के नजदीक अपार संपत्ति मिली ।आज भी श्यामली में शादीलाल के वंशजों के पास चीनी मिल और शराब कारखाना है ।
सर शादीलाल और सर शोभा सिंह के प्रति भारतीय जनता कि नजरों मे घृणा थी लेकिन शादी लाल को गांव वालों का ऐसा तिरस्कार झेलना पड़ा कि उसके मरने पर किसी भी दुकानदार ने अपनी दुकान से कफन का कपड़ा तक नहीं दिया । शादी लाल के लड़के उसका कफ़न दिल्ली से खरीद कर ले गए तब जाकर उसका अंतिम संस्कार हो पाया था।
शोभा सिंह खुशनसीब रहा । उसे और उसके पिता सुजान सिंह (जिसके नाम पर पंजाब में कोट सुजान सिंह गांव और दिल्ली में सुजान सिंह पार्क है) को राजधानी दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में हजारों एकड़ जमीन मिली और खूब पैसा भी मिला। उसके बेटे खुशवंत सिंह ने शौकिया तौर पर पत्रकारिता शुरु कर दी और उनको सर आखों पर बिठाया संघी मुखपत्र “पांचजन्य” ने जहाँ से उन्हों विधिवत पत्रकारिता प्रारंभ की और बड़ी-बड़ी हस्तियों से संबंध बनाना शुरु कर दिया। सर सोभा सिंह के नाम से एक चैरिटबल ट्रस्ट भी बन गया जो अस्पतालों और दूसरी जगहों पर धर्मशालाएं आदि बनवाता तथा व्यवस्था करता है ।
आज दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास बाराखंभा रोड पर जिस स्कूल को मॉडर्न स्कूल कहते हैं वह शोभा सिंह की जमीन पर ही है और उसे सर शोभा सिंह स्कूल के नाम से जाना जाता था । खुशवंत सिंह ने अपने संपर्कों का इस्तेमाल कर अपने पिता को एक देश भक्त और दूरद्रष्टा निर्माता साबित करने का भरसक कोशिश की।
बकौल खुशवंत सिह, बाद में शोभा सिंह ने यह गवाही दी, शोभा सिंह 1978 तक जिंदा रहा और दिल्ली की हर छोटे बड़े आयोजन में बाकायदा आमंत्रित अतिथि की हैसियत से जाता था।हालांकि उसे कई जगह अपमानित भी होना पड़ा लेकिन उसने या उसके परिवार ने कभी इसकी फिक्र नहीं की। खुशवंत सिंह का ट्रस्ट हर साल सर शोभा सिंह मेमोरियल लेक्चर भी आयोजित करवाता है जिसमे बड़े-बड़े नेता और लेखक अपने विचार रखने आते हैं, बिना शोभा सिंह की असलियत जाने (य़ा फिर जानबूझ कर अनजान बने) उसकी तस्वीर पर फूल माला चढ़ा आते हैं।
और भी गवाह निम्न लिखित थे।
  1. दीवान चन्द फ़ोगाट
  2. जीवन लाल
  3. नवीन जिंदल की बहन के पति का दादा
  4. भूपेंद्र सिंह हुड्डा का दादा
दीवान चन्द फोगाट D.L.F. कम्पनी का founder था इसने अपनी पहली कालोनी रोहतक में बनाई थी इसकी एक ही इकलौती बेटी थी जो कि के•पी• सिंह को ब्याही और वो के•पी •सिंह मालिक बन गये DLF का। अब के•पी•सिंह की भी इकलौती बेटी ही है जो कि कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आज़ाद के बेटे सज्जाद नबी आज़ाद के साथ ब्याही गई है। अब ये DLF का मालिक बनेगे। जीवनलाल मशहूर एटलस कम्पनी का मालिक था। इन्हीं की गवाही के कारण 14 फरवरी 1931 को भगतसिंह व अन्य को फांसी की सजा सुनाई गई।

मजदुर दिवस

मज़दूर दिवस की सद्कामनाएँ !
"कमाने वाला खाएगा, लूटने वाला जाएगा, नया ज़माना आएगा ।"
The worker will rule, the looter will have to go, Soon there will be a new dawn.
श्रमिक दिवस पर पेश है मेरे दिल के बेहद क़रीब साहिर की हर दौर में प्रासंगिक एक बेहतरीन रचना "मादाम" :
आप बेवजह परेशान-सी क्यों हैं मादाम ?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होंगे
मेरे अहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे ।
नूर-ए-सरमाया से है रू-ए-तमद्दुन की जिला
हम जहाँ हैं वहाँ तहज़ीब नहीं पल सकती
मुफलिसी हिस्स-ए-लताफत को मिटा देती है
भूख आदाब के साँचे में नहीं ढल सकती ।
लोग कहते हैं तो लोगों पे ताज्जुब कैसा
सच तो कहते हैं कि नादारों की इज़्ज़त कैसी
लोग कहते हैं, मगर आप अभी तक चुप हैं
आप भी कहिए ग़रीबो में शराफत कैसी ?
नेक मादाम ! बहुत जल्द वो दौर आयेगा
जब हमें जीस्त के अदवार परखने होंगे
अपनी ज़िल्लत की क़सम, आपकी अज़मत की क़सम
हमको ताज़ीम के मेआर परखने होंगे ।
हम ने हर दौर में तज़लील सही है लेकिन
हम ने हर दौर के चेहरे को ज़िया बख्शी है
हम ने हर दौर में मेहनत के सितम झेले हैं
हम ने हर दौर के हाथों को हिना बख्शी है ।
लेकिन इन तल्ख मुबाहिस से भला क्या हासिल ?
लोग कहते हैं तो फिर ठीक ही कहते होँगे
मेरे एहबाब ने तहज़ीब न सीखी होगी
मेरे माहौल में इन्सान न रहते होँगे ।
वजह-ए-बेरंगी-ए-गुलज़ार कहूँ या न कहूँ
कौन है कितना गुनहगार कहूँ या न कहूँ !

Sunday, April 29, 2018

Red Fort


“हनक सत्ता की सच सुनने की आदत बेच देती है,
हया को, शर्म को आखिर सियासत बेच देती है,
निकम्मेपन की बेशर्मी अगर आंखों पे चढ़ जाए,
तो फिर औलाद, “पुरखों की विरासत” बेच देती है!”
#RedFort

Sunday, April 15, 2018

मैं बुराई के ख़िलाफ़ आवाज़ सिर्फ इसलिए नहीं उठाता कि ये बुराई कल को मुझे भी प्रभावित कर सकता है।
मैं बुराई के ख़िलाफ़ इसलिए होता हूँ कि मैं एक अच्छा समाज देखना चाहता हूँ....

 ये जानते हुए कि बुराई रहित समाज नामुमकिन है मैं आवाज़ उठाता हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ मेरे आसपास का समाज ऐसा हो जहाँ मैं चैन व सुकून से जी सकूँ।
हाँ, मुझसे नहीं जीया जाता इस समाज में जहाँ धर्म, जाति, वर्ग, क्षेत्र, लिंग आदि के नाम पर शोषण के उदाहरण सेट किए जाते हैं, लेकिन मैं मर नहीं सकता।
 क्योंकि कहीं न कहीं मैं भी मर जाने को हार मान लेना मानता हूँ और हार मानना ही होता तो बहुत पहले मान लेता...

मुझे जीतना है और जीत न भी सका तो आख़िरी वक़्त तक कोशिश करता रहूँगा और एक अच्छे समाज के निर्माण में अपनी पूरी ऊर्जा लगाता रहूंगा।
मेरा "अच्छा समाज" कोई Utopia, कोई कल्पनालोक बन कर नहीं रह जाएगा। मुझे यक़ीन है कुछ साथी दृढ़ निश्चय से इस सफर में हमारे साथ हैं हम उस अच्छे समाज को हक़ीक़त में बदलने की हर वो कोशिश करूँगा जो कर सकते हैं।

Saturday, April 14, 2018

15 अप्रैल की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ – Important events of April 15

15 अप्रैल की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ – Important events of April 15

  • फ्रांस ने 1689 में स्पेन के खिलाफ युद्ध की घोषणा की।
  • अमेरिका में 1817 में बधिर बच्चों के लिए पहला स्कूल खोला गया।
  • बाल गंगाधर तिलक ने 1895 में रायगढ़ किले में शिवाजी उत्सव का उद्घाटन किया।
  • डाईबिटीज से पीड़ित लोगों के लिए 1923 में इंन्सुलिन बाजार में उपलब्ध हुआ।
  • तत्कालीन सोवियत संघ और स्विट्जरलैंड राजनयिक संबंध बनाने पर 1927 में सहमत हुए।
  • हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना 1948 में आज ही के दिन हुई।
  • अमेरिका ने 1955 में नेवादा परीक्षण स्थल पर परमाणु परीक्षण किया।
  • भारत सहित 109 देशों द्वारा 1994 में ‘गैट’ समझौते की स्वीकृति।
  • थम्पी गुरु के नाम से प्रसिद्ध फ़्रेडरिक लेंज का 1998 में निधन।
  • आतंकवाद से निपटने के लिए सहयोग के आहवान के साथ “जी -77 शिखर सम्मेलन” सन 2000 में हवाना में सम्पन्न।
  • ब्रिटेन में आयरिश रिपब्लिकन आर्मी ने 2003 में हथियार डाल देने का निर्णय लिया।
  • राजीव गांधी हत्याकांड से जुड़े लिट्टे उग्रवादी वी. मुरलीधरन की 2004 में कोलम्बो में हत्या की गयी।
  • इंटरपोल ने 2006 के जकार्ता सम्मेलन में एंटी करप्शन एकेडमी के गठन का प्रस्ताव सुझाया।
  • पाकिस्तान की एक जेल पर 2012 में हुए हमले के बाद 400 आतंकवादी फरार हुए।
  • इराक में 2013 में हुए बम विस्फोट से तक़रीबन 35 लोगों की जान गयी और 160 घायल हुए।

15 अप्रॅल को जन्मे व्यक्ति – Born on 15 April

  • 1452 में इटलीवासी, महान चित्रकार लिओनार्दो दा विंचीका जन्म।
  • सिख धर्म के संस्थापक गुरू नानक का 1469 में जन्म हुआ।
  • 1563 में सिक्खों के पाँचवें गुरु गुरु अर्जन देव का जन्म।
  • 1865 में खड़ी बोली के प्रथम महाकाव्यकार अयोध्यासिंह उपाध्याय का जन्म।
  • 1940 में भारत के प्रसिद्ध सारंगी वादक और शास्त्रीय गायक- सुल्तान ख़ान का जन्म।
  • 1960 में मध्य प्रदेश की राजनीति में ‘भारतीय जनता पार्टी’ के प्रसिद्ध नेता नरोत्तम मिश्रा का जन्म।
  • 1972 में बालीवुड अभिनेत्री, क्रिकेट ग्लैमर और फैशन की मूर्ति मंदिरा बेदी का जन्म।
15 अप्रॅल को हुए निधन – Died on 15 April
  • चित्रकार नंदलाल बोस का 1966 में निधन।
  • हैजा के जीवाणु पर शोध कार्य करने वाले भारतीय वैज्ञानिक शंभुनाथ डे का 1985 में निधन।
  • थम्पी गुरु के नाम से प्रसिद्ध फ़्रेडरिक लेंज का निधन 1998 को हुआ था।
15 अप्रॅल के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव – Important events and festivities of 15 April
  • रेल सप्ताह
  • फ़ायर सर्विस सप्ताह
बाबुल इनायत
9507860937

Friday, April 6, 2018

क्या आप जानते है इंटरनेट का आविष्कार कब, कहां, किसने और क्यों किया?


Internet Invention Information Hindi.


Internet Invention Information Hindiहालांकि वर्ल्ड वाइड वेब को शुरू में एक व्यक्ति ने आविष्कार किया था, लेकिन इंटरनेट की उत्पत्ति में कई व्यक्तियों और ग्रुप का प्रयास था। इसका जन्म हमें शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और यूएसएसआर के बीच टेक्नोलॉजी के अत्यंत प्रतिस्पर्धी यूग में वापस ले जाता है।
सोवियत संघ ने 4 अक्टूबर, 1957 को Sputnik 1 उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजा। आंशिक रूप से इसकी प्रतिक्रिया में, अमेरिकी सरकार ने 1958 में Advanced Research Project Agency को बनाया, जिसे आज DARPA -डिफेंस Defense Advanced Research Projects Agency के रूप में जाना जाता है। इस एजेंसी का विशिष्ट मिशन था Sputnik 1 उपग्रह के प्रक्षेपण के टेक्नोलॉजी को रोकना।

J C R Licklider-Who invented the internet
J C R Licklider

ऐसे प्रयासों के समन्वय के लिए, विभिन्न विश्वविद्यालयों और प्रयोगशालाओं के बीच डेटा का आदान-प्रदान करने के लिए एक फास्‍ट तरीके कि जरूरत थी। इसके लिए J. C. R. Licklider ने इंटरनेट के सैद्धांतिक आधार के लिए “Intergalactic Computer Network” बनाया। उनका विचार एक ऐसा नेटवर्क बनाना था, जहां कई अलग-अलग कंप्यूटर सिस्टम एक दूसरे के साथ आपस में इस तरह से कनेक्‍ट होंगे, जो डेटा का शीघ्र गती से आदान-प्रदान कर सकेंगे।
लॉरेंस जी रॉबर्ट्स के 1966 पब्लिकेशन “Towards a Cooperative Network of Time-Shared Computers” से ARPANET (Advanced Research Projects Agency Network) कि आइडिया का जन्‍म हुआ।
जनवरी 1969 में, Advanced Research Projects Agency of the Department of Defense (ARPA) ने एक कम्युनिकेशन नेटवर्क के डिजाइन और निर्माण के लिए बोल्ट, बेरनेक और न्यूमैन (बीबीएन) को कॉन्ट्रैक्ट दिया।
सन 1969 के अंत में ARPANET नें कैलिफोर्निया लॉस एंजिल्स (UCLA), कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के सांता बारबरा (UCSB), उटाह यूनिवर्सिटी और स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट (SRI) के चार नोड को कनेक्‍ट किया गया।
ARPANET-Who invented the internet
इस नेटवर्क का पहला उपयोग 29, 1969 को 10:30 बजे हुआ और यह UCLA और स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टीट्यूट के बीच एक कम्युनिकेशन था।
परमाणु युद्ध के खतरे के साथ, एक ऐसी सिस्‍टम को विकेंद्रीकृत करने के लिए आवश्यक थी, जिसमें एक नोड नष्ट हो गया हो, तो फिर भी अन्य सभी कंप्यूटरों के बीच कम्युनिकेशन हो सके। अमेरिकी इंजीनियर पॉल बारन ने इस मुद्दे का समाधान प्रदान किया; उन्होंने एक विकेन्द्रीकृत नेटवर्क तैयार किया जो डाटा भेजने और प्राप्त करने के लिए पैकेट स्विचिंग का इस्तेमाल करता था।
कई अन्य लोगों ने एक कुशल पैकेट स्विचिंग सिस्टम के विकास में योगदान दिया, जिसमें लियोनार्ड क्लेनरॉक और डोनाल्ड डेविस शामिल थे। यदि आप “पैकेट स्विचिंग” से परिचित नहीं हैं, तो यह मूल रूप से सभी ट्रांसमिटेड डेटा को उपयुक्त-आकार वाले ब्‍लॉक में ब्रेक करता है, जिन्‍हे पैकेट कहा जाता है। इन पैकेटस् को अलग अलग मार्ग से डेस्टिनेशन तक भेजा जाता है।
Packet Switching-Who invented the internet
उदाहरण के लिए, यदि आप किसी अन्य सिस्टम से बड़ी फ़ाइल एक्सेस करना चाहते हैं, तो जब आप इस फाइल को डाउनलोड करने का प्रयास करते हैं, तब एक ही स्‍ट्रीम में पूरी फाइल भेजने के लिए लगातार कनेक्शन की आवश्यकता होती है। इसके बजाय, यह डेटा के छोटे पैकेटों में विभाजित होता है, और प्रत्येक पैकेट व्यक्तिगत रूप से अलग अलग पाथ से भेजा जाता है। जो सिस्‍टम इस फाइल को डाउनलोड करती है, वह इन पैकेटस् को एकत्रित कर दोबारा मूल पूर्ण फ़ाइल बनाता है।
1972 तक, ARPANET से कनेक्‍ट कंप्यूटरों की संख्या 23 हो गई थी और यह वह समय था, जब इलेक्ट्रॉनिक मेल (ईमेल) शब्द का इस्तेमाल पहली बार किया गया था। कंप्यूटर वैज्ञानिक रे टेमलिन्सन ने ARPANET में ई-मेल सिस्टम का इस्तेमाल किया था, जिसमें ईमेल भेजने वाले का नाम और नेटवर्क के नाम को अलग करने के लिए “@” सिंबॉल का इस्‍तेमाल किया गया।
इन डेवलपमेंट के साथ, इंजीनियरों ने अधिक नेटवर्क बनाए, जो कि X.25  और UUCP जैसे विभिन्न प्रोटोकॉल का इस्तेमाल करते थे। ARPANET द्वारा कम्युनिकेशन के लिए मूल प्रोटोकॉल NCP (Network Control Protocol) इस्तेमाल किया गया था।
अब एक ऐसे प्रोटोकॉल की ज़रूरत थी, जो सभी नेटवर्कों को एकजुट कर सके।
1974 में कई असफल प्रयासों के बाद, विंट सर्फ और बॉब काहन द्वारा एक पेपर प्रकाशित किया, जिसे “The Fathers Of The Internet” के रूप में भी जाना जाता है। इसका नतीजा TCP (Transmission Control Protocol) मे हुआ, जो 1978 में TCP/IP (आईपी का मतलब इंटरनेट प्रोटोकॉल) बन गया।
हाई लेवल पर TCP/IP एक सिस्‍टम है, जो यह सुनिश्चित करती है कि डेटा के पैकेटस् को भेजा और प्राप्‍त किया जा रहा है। और फिर पैकेटस् को उचित क्रम में असेंबल्ड किया जाता है, जिससे डाउनलोड किए डेटा को ओरिजनल डेटा के साथ मिलाया जाता है। इसलिए, यदि कोई पैकेट ट्रांसमिशन में खो जाता है, तो टीसीपी एक ऐसी सिस्‍टम है जो यह पता लगाती है और सुनिश्चित करती है कि गायब पैकेट पुनः प्राप्त हो और सफलतापूर्वक प्राप्त हो।
1 जनवरी, 1983 को, TCP/IP प्रोटोकॉल ARPANET के लिए विशेष कम्युनिकेशन प्रोटोकॉल बन गया।
इसके साथ ही 1983 में, पॉल मोकपेट्रिस ने इंटरनेट नाम और एड्रेस पेयर पेअर के वितरित डाटाबेस का प्रस्ताव प्रस्ताव रखा, जिसे अब Domain Name System (DNS) कहा जाता है। यह वास्तव में एक डिस्ट्रिब्यूटेड “फोन बुक” है जिसमें डोमेन नेम को आईपी एड्रेस के साथ लिंक किया जाता है। इससे आप किसी भी वेब साइट के आईपी एड्रेस को टाइप करने के बजाय उसका नाम टाइप कर सकते है।
जैसे गूगल के लिए ब्राउजर में 172.217.24.132 यह आईपी टाइप करने के बजाय आप www.google.com टाइप कर सकते है।
इस सिस्‍टम के डिस्ट्रिब्यूटेड वर्जन ने इसके डिसेंट्रलाईज़ अप्रोच के लिए अनुमति दी। इससे पहले, एक सेंट्रल hosts.txt फाइल को स्टैनफोर्ड रिसर्च इंस्टिट्यूट मे मेंटेन किया जाता था। इसे बाद में डाउनलोड कर अन्‍य सिस्‍टम द्वारा उपयोग किया जाता था। बेशक, 1983 तक भी, इसे मेंटेंन करना एक समस्‍या थी और डिसेंट्रलाईज़ अप्रोच कि जरूरत बढ़ रही थी।
इसकी वजह से सन 1989 में CERN (European Organization for Nuclear Research) के टिम बर्नर्स-ली ने इंटरनेट पर इनफॉर्मेशन डिस्ट्रिब्यूट करने के लिए एक सिस्‍टम डेवलप की और इसे World Wide Web नाम दिया।
इंटरनेट के साथ हाइपरटेक्स्ट सिस्टम (लिंक किए गए पेजेस) से आज कि मौजूदा सिस्‍टम बनी है।
यह वेब सर्वर और वेब ब्राउज़रों के सरल इम्प्लिमेन्टेशन को प्रदान करता है और यह एक पूरी तरह से ओपन प्लेटफार्म है, जिसमें कोई भी रॉयल्टी का भुगतान किए बिना स्वयं के सिस्टम को डेवलप कर सकता है।
यह सब करने की प्रोसेस में, बर्नर्स-ली ने URL फॉर्मेट, Hypertext Markup Language (HTML), और Hypertext Transfer Protocol (HTTP) को डेवलप किया।
इसी समय, वेब के सबसे लोकप्रिय विकल्पों में से एक, गोफर सिस्टम ने घोषणा की कि वह अब उपयोग करने के लिए फ्री नहीं होगा, और इसे वर्ल्ड वाइड वेब पर कई स्विच के साथ प्रभावी ढंग से मार डाला जाएगा।
आज, वेब इतनी लोकप्रिय है कि कई लोग अक्सर इसे इंटरनेट के रूप में सोचते हैं, हालांकि यह ऐसा मामला बिल्कुल भी नहीं है।
इसके अलावा वर्ल्ड वाइड वेब के निर्माण के दौरान, इंटरनेट के व्यावसायिक उपयोग पर लगे प्रतिबंध धीरे-धीरे हटा दिए गए, जो इस नेटवर्क की अंतिम सफलता में एक अन्य महत्वपूर्ण तत्व था।
इसके बाद, 1993 में, मार्क एंड्रेसन के नेतृत्व में मोजाइक नामक वर्ल्ड वाइड वेब के लिए एक ब्राउज़र डेवलप किया गया। यह अमेरिकी सरकार की पहल और फंडिंग से डेवलप एक ग्राफिकल ब्राउज़र था।
बाबुल इनायत
+91 9507860937