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Sunday, November 11, 2018

मैं मुसलमान हूँ: बाबुल इनायत

मैं मुस्लमान हुं

मै मुस्लमान हूँ, मै प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री   नही बन सकता, क्योकि मेरी तादाद कम है और जातिवाद ज्यादा,  लेकिन मैं कलेक्टर, एडीएम, तहसीलदार, कमिश्नर, एसपी, डीएसपी तो बन ही सकता हूँ।
     लेकिन मै निकम्मा हूं


       मुझ से घंटो पढ़ाई नही होती, अगर मैं पढ़ने लग गया तो चौराहों की रौनकें ख़त्म हो जाएगी, जो की मै होने नही दूंगा, मै पढ़ गया तो गुटखा, ताश पत्तियां छूट जाएगी जो की मै छोड़ना नही चाहता।
        मै पढ़ गया तो मुहल्ले की रौनक कम हो जाएगी, दिन भर आवारा गिर्दी इन्ही मुहल्ले में ही तो करता हूँ मै,  हां! काम नही है मेरे पास, लेकिन क्या फ़र्क़ पढता है, अल्लाह दो वक़्त की रोटी तो खिला ही देता है ना!

     हां मै मुसलमान हूँ, और पैदा होते है एक सील ठप्पा लग गया था मेरी तशरीफ़ पर कि मै पंचर की दूकान खोलूंगा या हाथो में पाने पकड़ कर गाड़ियां सुधारूँगा, या बहुत ज्यादा हुआ तो दूसरों की गाड़ियां चलाऊंगा।
       हां मै मुसलमान हूँ, , अपने भाइयो की टांग खिंचाई, मेरा अहम शगल है।
   
     आखिर मै क्यों नही पढा ?  या मै क्यों नही पढ़ नही पाया? ये सवाल हो सकता है! लेकिन मैं अनपढ़ हूं इसमें शक नही!

       हां मै मुसलमान हूं,और हिंदुस्तान में 30 करोड़ हुँ , लेकिन मै ज्यादातर अनपढ़, गरीब, गन्दी बस्तियों में ही हूं, इसका दोष मै दुसरो पर मंढता हूं, मै चाहता हूँ कि मेरे घर आंगन की झाड़ू लगाने भी सरकार आये।

    मै मुसलमान हूं, घर के सामने अतिक्रमण करना भी मेरा अहम शग़ल है, मै पंद्रह फिट की रोड को आठ फिट की करने मै भी माहिर हुँ, फिर उस आठ फिट की रोड़ पर रिक्शा खड़ी करना भी मेरा अधिकार है, हां मै मुसलमान हूँ, जिसका धर्म 'पाकी आधा ईमान', 'तालीम अहम बुनियाद है' मानने वाला है लेकिन मै इस पर कभी अमल नही करता ।
       मै हमेशा सउदी अरब दुबई जैसे देशों की दुहाई देकर अपनी बडाइयां करता हूँ, लेकिन मैने हिंदस्तान में खुद पर कभी कोई सुधार नही किया, न मै सुधरना चाहता हूँ।
हां मै मुसलमान हूं, मै अनपढ़ हूँ, क्यों की माँ-बाप ने बचपन से गैरेज पर नौकरी से लगाया और मै गरीब घर से हुँ।

      बेहतर तालीम देने के लिए माँ-बाप के पास रुपया नही है, और मेरी कौम तालीम से ज्यादा लंगर को तवज्जोह देती है, वो खिलाने मात्र को सवाब समझती है।

      मै मुसलमान हूं, मै खूब गालियां देता हूं, मै रिक्शा चलाता हूं, दूध बेचता हूं वेल्डिंग करता हूं मै गैरेज पर गाड़िया सुधारता हु, मै चौराहे पर बैठ कर सिगरेट पीता हूं,गांजा पिता हूं, ताश पत्ते खेलता हूं, क्योंकी मै अनपढ़ हूं, और मै अनपढ़ सिर्फ दो वजह से हूं, एक–माँ-बाप की लापरवाही, दूसरा –कौम के जिम्मदारो की लापरवाही ।
      माँ-बाप मजबूर थे, लेकिन मेरी कौम मजबूर न थी, न है! मैने आंखो से देखा है लाखो रुपयों के लंगर कराते हुए, मैने आँखों से देखा है लाखों रुपए कव्वाली पर उड़ाते हुए, मैने आँखों से देखा है बेइंतहा फ़िज़ूल खर्च करते हुए।
   काश! मेरे माँ-बाप या मेरी कौम मेरी तालीम की फ़िक़्र मंद होती तो आज मै प्रधान मंत्री या मंत्री न सही, लेकिन मैं आज क्लेक्टर, एडीएम,कमिश्नर जैसे बड़े पदों पर होता, बिना वोट पाये भी लाल बत्ती में होता, या कम से कम मै डॉक्टर,इंजिनियर,आर्किटेक्चर,या एक अच्छा बिजनेस मैन तो होता ही, लेकिन बचपन से मन में एक वहम घर कर गया है, "कि मियां तुम मुसलमान हो और मुसलमानो को यहाँ नौकरी आसानी से नही मिलती" लेकिन मैं ये तो भूल ही गया कि मेरे नबी ने तमाम जिंदगी तिजारत ही की और तालीम पर अहम् जोर दिया, फिर मै उनका उम्मती होकर नौकरी न मिलने की बात सोच कर तालीमात क्यों हासिल नही करता ?

  (नोट- दोस्तों ये तहरीर सिर्फ इस्लाही पोस्ट के लिए लिखी गयी है, रिक्शा चला कर पेट पालना या वेल्डिंग करना  दूध बेचना गैरेज के पाने उठाना या मजदूरी करना कोई गलत काम नही, लेकिन हम इसके लिए पैदा हुए है ये सोच कर तालीम हासिल न करना गलत है, खूब पढ़ाई करो, कि हर पद पर सिर्फ तुम दिखो, तुम्हे इज्जत से देखे, तुम पढ़े लिखे तबके में गिने जाओ, अंधविश्वास से दूर एक नयी जिंदगी जीकर मुल्क़ व क़ौम की ख़िदमत करे  और.....जहां प्रोपोगंडा नामक चीज ही न हो, आने वाली नस्लो को पढा लिखा कर हम अब तक के अपने इतिहास को बदल दे, यही एक ललक है कि ये कौम एक नया सवेरा देखे, कि जब भी सुबह का अखबार देखे हर अखबार के फ्रंट पेज पर आये  इस शहर के नए कलेक्टर नए एडीएम नए कमीशनर तुम हो!!
बाबुल इनायत 

9507860937

राजद नेता अररिया बिहार